Wheat Crop Disease: गेहूं की फसल में लगने वाले भूरा रतुआ रोग के लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान और नमी युक्त जलवायु मफीद है। इसके साथ ही गेंहू में काला रतुआ भी 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान और नमी रहित जलवायु में होता हैं। ऐसे में अब किसानों को अपनी खेतों में खडी गेहूं की फसल को लेकर अलर्ट रहना चाहिए। आगरा, उत्तर प्रदेश
Wheat Crop Disease: देश में रबी सीजन (Rabi season) की मुख्य फसल गेहूं (Wheat Crop) है। जिसकी इस साल बंपर बुवाई हुई है। कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) के आंकडे देखें तो इस साल अब तक 325 लाख हेक्टेयर रकबा में गेंहू की खेती हो रही है। किसानों ने अच्छे दाम की उम्मीद में इस साल गेंहू की खेती बढ़ा दी है। लेकिन, गेंहू की फसल में अच्छे उत्पादन के लिए फसल का रोगों से बचाव करना बेहद जरूरी है। इस समय जो मौसम में बदलाव हुआ है। जो गेंहू की फसल के लिए सही नहीं हैं। इस मौसम में गेंहू (Wheat Crop Disease) की फसल में काला, भूरा या पीला रतुआ रोग लगने की संभावना अधिक रहती है। ऐसे में किसान सतर्क रहें और अपनी गेंहू की फसल की सही तरह से देखरेख करें। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिकों ने गेंहू (Wheat Crop Disease) में लगने वाले काला, भूरा या पीला रतुआ रोग को लेकर एडवाइजरी जारी की है। इसके साथ ही प्याज में थ्रिप्स का, टमाटर में फल छेदक और अन्य फसल में लगने वाले रोगों को लेकर अलर्ट जारी किया है।
🌿 गेहूं में रतुआ रोग क्या होता है?
रतुआ एक प्रकार का फफूंदजनित रोग है। जो पौधे की पत्तियों, तनों और बालियों पर आक्रमण करता है। यह रोग तीन प्रकार का होता है।
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पीला रतुआ (Yellow Rust):
यह सबसे पहले ठंडे और नम क्षेत्रों में दिखाई देता है। यह पत्तियों पर पीली धारियों के रूप में दिखता है। -
भूरा रतुआ (Brown Rust):
यह गर्म और आर्द्र जलवायु में सक्रिय होता है। इसके दाग भूरे रंग के होते हैं और पूरे पौधे में फैल सकते हैं। -
काला रतुआ (Black Rust):
यह सबसे गंभीर होता है और तने के साथ-साथ बालियों को भी प्रभावित करता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agricultural Research Institute) के वैज्ञानिकों की एडवाइजरी के मुताबिक गेंहू की फसल में लगने वाले पीला रतुआ रोग के लिए 10-20 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त है। लेकिन, जब तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा तो इस रोग का फैलाव नहीं होगा। ऐसे ही गेंहू की फसल में लगने वाले भूरा रतुआ रोग के लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ नमी युक्त जलवायु आवश्यक होती है। इसलिए, किसान भूरा रतुआ रोग को लेकर अपने खेतों की देखभाल करते रहें। जैसे ही गेंहू में भूरा रतुआ रोग दिखे तो तत्काल सतर्क हो जाएं। इसके साथ ही इस समय गेंहू की फसल में काला रतुआ रोग भी लगता है। काला रतुआ रोग के लिए 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान और नमी रहित जलवायु जरूरी होती है। ऐसे में गेहूं की फसल को लेकर किसानों को अलर्ट रहना चाहिए।
काला रतुआ रोग के लक्षण (Symptoms of Black Rust Disease)
- पौधे के तने और पत्तियों पर गहरे रक्ताभ भूरे रंग के फफोले बनते हैं।
- ये फफोले आपस में मिलकर पौधे के बड़े क्षेत्रों को घेर लेते हैं।
- संक्रमण बढ़ने पर फुंसियों का रंग बदलकर काला हो जाता है।
- संक्रमण से तना कमज़ोर होने के साथ ही हवा और बारिश से गिर जाते हैं।
- संक्रमण गंभीर होने पर गेंहू के दाने कमज़ोर और झुर्रीदार बनते हैं।
भूरे रतुआ रोग के लक्षण (Symptoms of Brown Rust Disease)
- गेंहू की पत्तियों पर नारंगी रंग के धब्बे हो जाते हैं।
- ये नारंगी रंग के धब्बे बाद में गहरे भूरे रंग हो जाते हैं।
- गेंहू के पौधों की पत्तियां जल्दी से सूख जाती हैं।
- गेंहू के पौधों कीं पत्तियों पर भूरे रंग का चूर्ण बिखरा दिखता है।
🌦️ कौन-से मौसम में होता है ज्यादा खतरा?
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जब दिन और रात के तापमान में भारी अंतर हो (जैसे दिन में गर्मी और रात में ठंड)
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अधिक नमी और कुहासा
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कम धूप और उच्च आर्द्रता
(Note: इस तरह की जलवायु रतुआ रोग को पनपने के लिए आदर्श स्थिति देती है।)
पीले रतुआ रोग लक्षण (Symptoms of Yellow Rust Disease)
- गेहूं की फसल में पौंधे के पत्तों पर पीले रंग के धब्बे दिखना।
- गेहूं की फसल में पौधे की पत्तियों पर पीली रेखाएं या धारियां बनना।
- गेहूं की फसल में पौधों की पत्तियां सिकुड़ और मुरझा जाती हैं।
- गेहूं की फसल में पत्तियों पर नारंगी-पीले रंग के दाने दिखते हैं।
- गेहूं की फसल में गेहूं के दाने छोटे और कमज़ोर हो जाता है।
- गेंहू की फसल में संक्रमित पौधे की पत्तियां सूखकर गिर जाना।
- ये यह रोग ठंडी और नम जलवायु में ज़्यादा फैलता है।
डाइथेन एम-45 का छिड़काव करें (Spray Dithane M-45)
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिकों की एडवाइजरी के मुताबिक यदि गेंहू की फसल में कोई रोग लगता दिखाई दे तो सतर्क हो जाएं। इसको लेकर लापरवाही नहीं बरतें। इस मौसम में गेंहू की फसल को रोग से बचाना बेहद जरूरी है। आगरा के कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ (Dr. Rajendra Singh Chauhan) डॉ. राजेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि किसानों को गेंहू की फसल को लेकर मौसम में जो बदलाव हुआ है। उसको लेकर अलर्ट रहना पड़ेगा। ये समय ऐसा ही है। इस मौसम को ध्यान में रखकर किसान गेहूं की फसल में रोगों को लेकर सतर्क रहें। इस समय जो तापमान है। उसकी वजह से इस मौसम में गेंहू की फसल में विशेषकर रतुआ रोग लग सकते हैं। अभी का मौसम गेंहू की फसल में काला रतुआ, भूरा रतुआ या पीला रतुआ रोग लगने का है। इसलिए गेंहू की फसल की देखरेख करें। इसके साथ ही यदि गेंहू की फसल में काला रतुआ, भूरा रतुआ या पीला रतुआ रोग लगे तो फसल में डाइथेन एम-45 (2.5 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें।
📣 किसान भाइयों के लिए सुझाव
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कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या स्थानीय कृषि अधिकारी से समय-समय पर सलाह लें।
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सामूहिक छिड़काव करें ताकि रोग एक खेत से दूसरे खेत में न फैले।
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यदि संभव हो तो रतुआ प्रभावित फसल के स्थान पर वैकल्पिक फसलें अपनाएं।
प्याज में थ्रिप्स का हो सकता है अटैक (Onion may be attacked by Thrips)
जिस तरह से अभी मौसम में बदलाव हुआ है। इससे खेतों में बोई गई प्यज की फसल में थ्रिप्स का आक्रमण हो सकता है। ऐसे में किसान इस मौसम में प्याज की निरंतर निगरानी करें। यदि कीट के पाए जाने पर कानफीड़ोर @ 0.5 मिली/3 लीटर पानी किसी चिपकने वाले पदार्थ जैसे टीपोल आदि (1.0 ग्राम प्रति एक लीटर घोल) में मिलाकर छिड़काव करें। इसके साथ ही प्याज की फसल में नीला धब्बा रोग की निगरानी करें। इस रोग के लक्षण पाए जाने पर डाएथेन-एम-45 @ 3 ग्रा./लीटर पानी किसी चिपकने वाले पदार्थ जैसे टीपोल आदि (1 ग्रा. प्रति एक लीटर घोल) में मिलाकर छिड़काव करें। जिससे ये रोग नियंत्रित होंगे।
टमाटर में फली छेदक कीट का यूं करें कंट्रोल (Control the pod borer in tomato like this)
इस मौसम में टमाटर के फलों को फली छेदक कीट का खतरा अधिक लग रहा है। इससे बचाव के लिए किसान खेत में पक्षी बसेरा लगाएं। वे कीट से नष्ट फलों को इकट्ठा कर जमीन में दबा दें। इसके साथ ही फल छेदक कीट की निगरानी के लिए फिरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल करें। इसकी रोकथाम के लिए प्रति एकड़ 2-3 ट्रैप पर्याप्त है।
बैंगन में फली छेदक कीट का यूं करें कंट्रोल (Control the pod borer in eggplant like this)
ऐसे ही इस मौसम में बैंगन की फसल को फल छेदक कीट से बचाव बेहद जरूरी है। इसके लिए इस कीट से ग्रसित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। ऐसे में यदि कीट की संख्या अधिक हो तो स्पिनोसेड कीटनाशी 48 ईसी @ 1 मिली/4 लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q: गेंहू की फसल में लगने वाले रतुआ रोग क्या है?
👉 A:गेहूं की पत्तियों, तनों और बालियों पर लगने वाला एक फफूंद जनित रोग रतुआ है, जो फसल को नुकसान पहुंचाता है।
Q: रतुआ रोग के कितने प्रकार होते हैं?
👉 A: गेंहू की फसल में लगने वाला रतुआ रोग के तीन मुख्य प्रकार होते हैं। जो पीला रतुआ, भूरा रतुआ और काला रतुआ हैं।
Q: भूरा रतुआ रोग के लिए सबसे उपयुक्त मौसम क्या है?
👉 A: गेंहू की फसल में भूरा रतुआ रोग 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान और नमी युक्त मौसम में अधिक होता है।
Q: काला रतुआ रोग के लक्षण क्या होते हैं?
👉 A: गेंहू की फसल में लगने वाला काला रतुआ रोग में तने और पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के फफोले बनते हैं। जिससे गेंहू का तना कमजोर हो जाता है। जिससे गेंहू के दाने कमजोर हो जाते हैं।
Q: रतुआ रोग से बचाव कैसे करें?
👉 A: गेंहू की फसल में लगने वाले रतुआ रोग दिखते ही डाइथेन एम-45 का छिड़काव करें। इसके साथ ही समय-समय पर कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेते रहें।