Green Fodder: हरे चारे के रूप में पशुओं की पहली पसंद बरसीम को माना जाता है। बरसीम सुपाच्य और पोषक तत्वों से भरपूर है। इसकी खेती रबी सीजन में की जाती है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि प्रदेशों में बरसीम की खेती को किसान हरे चारे के लिए प्राथमिकता के तौर पर करते हैं। अधिक उत्पादन के लिए किसानों को जरूरत है सही समय और सही बीज के चयन की। अपने जिले में बने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से किसान खेती से संबंधित जानकारी जरूर लें।
आगरा/लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
Green Fodder: बरसीम की खेती सबसे महत्वपूर्ण शीतकालीन दलहनी और चारे (Green Fodder) की मुख्य फसल है। इसके चारे में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। बरसीम चारे ( Barseem cultivation) की फसलों के राजा के रूप में भी जानी जाती है। बरसीम के हरे चारे में 70 प्रतिशत पाचनयोग्य शुष्क पदार्थ के साथ-साथ 17-22 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 42-49 प्रतिशत एनडीएफ, 35-38 प्रतिशत एडीएफ, 24-25 प्रतिशत सेल्यूलोज और 7-10 प्रतिशत हेमी सेल्यूलोज होता है। इसके अलावा बरसीम मिट्टी के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों को बेहतर बनाती है। बरसीम का चारा स्वादिष्ट, पौष्टिक और पाचक होता है। इसके चारे में प्रोटीन की मात्रा भरपूर होने के कारण इसको अदलहनी चारा जैसे जई के साथ मिलाके खिलाना एक अच्छी तकनीक है। क्योंकि इससे पशुओं को प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं खनिज तत्व संतुलित मात्रा में मिलते है, जिससे पशुओं का स्वास्थ्य एवं उत्पादकता अच्छी होती है।
मस्कावी, वरदान, पूसा जायंट से 675-725 प्रति कुंतल हरा चारा मिलता है। जेबी-1, 2, 3, यूपीबी-110, बीबी-2 से 650-850 प्रति कुंतल हरा चारा मिलता है। बीसी-180, जेबी-1 से 750-850 पेट कुंतल हरा चारा मिलता है। बीसी-180, बीबी-3, बीएल-1, 2, 10, 22 से 650-750 प्रति कुंतल हरा चारा मिलता है। जेएचबी-17-1, जेएचबी-17-2 से 800-850 प्रति कुंतल हरा चारा मिलता है।
Green Fodder: बरसीम की खेती के लिए जलवायु एवं मृदा Climate and soil for Barseem cultivation
बरसीम की अच्छी वृद्धि के लिए अर्ध शुष्क एवं ठंड़ी जलवायु की आवश्यकता होती है। यह ठंडी और मध्यम ठंडी जलवायु के अनुकूल है। 150 सेंटीमीटर से कम वार्षिक वर्षा वाले स्थानों पर सफलतापूर्वक उगायी जाती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी जड़ों में उपस्थित जीवाणु निष्क्रिय हो जाते हैं, जिससे जड़ें सड़ जाती हैं। कम वर्षा वाले स्थानों में सिंचाई की अच्छी व्यवस्था की आवश्यकता होती है। बरसीम की बुवाई और विकास के लिए अधिकतम तापमान 20-25 डिग्री सेल्सियस है। बरसीम के लिए अच्छी जल निकास वाली दोमट और भारी दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से और बाद की 2 या 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करें।

Green Fodder: बरसीम की बुवाई का समय Barseem sowing time
बरसीम की बवुाई का समय एक महत्वपूर्ण कारक है, जो अकंरुण, कटाई की संख्या और उत्पादन को प्रभावित करता है। जब तापमान 25-27 सेल्सियस डिग्री हो तब बुवाई करनी चाहिए। इसलिए पंजाब, हरियाणा और उत्तर उत्तरप्रदेश में बरसीम की बुवाई का उचित समय अक्टबूर है। बंगाल और गजुरात में फसल को नवम्बर में बोया जा सकता है। पूर्वी क्षेत्रों में दिसम्बर के पहले सप्ताह तक बुवाई की जा सकती है। फसल की समय पर बुवाई करने पर हरा चारा अधिक मात्रा में और अधिक समय तक मिलता है। उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में बरसीम की भरपूर उपज लेने के लिए बुवाई मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्वर तक कर देनी चाहिए। समय से पहले बुवाई करने पर अधिक तापमान के कारण अंकुरण एवं जमाव कम होता है। खेत में खरपतवार भी अधिक उगते हैं। देर से बुवाई करने पर कम तापमान रहने के कारण पौधों के विकास एवं बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
Green Fodder: बरसीम की खेती के लिए बीज एवं बुवाई Seeds and sowing for Barseem cultivation
सामान्य स्थिति में बरसीम की अधिकतम बीज दर 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। बुवाई के लिए बेड़ में 4-5 सेंटीमीटर की गहराई तक पानी भरें। हल्की पडलिंग करें। बुवाई शाम को या जब हवा नहीं चले तब करें। साधारणतः बरसीम के बीज के साथ कासनी के बीज भी मिले होते हैं। इनको अलग करने के लिए पांच प्रतिशत नमक के घोल में बरसीम के बीजों को डालते हैं। कासनी के बीज हल्के होने के कारण घोल के ऊपर तैरने लगते हैं। इनको घोल से अलग करके बीज को स्वच्छ पानी से कई बार धोते हैं।
Green Fodder: बरसीम के बीज का ऐसे करें उपचार Treat Barseem seeds like this
कृषि विज्ञान केंद्र आरबीएस कॉलेज बिचपुरी के विशेषज्ञ पशुपालन धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि अधिक उपज प्राप्त करने के लिए बरसीम के बीज को राइजोबियम ट्राइफोलाई नामक बैक्टीरिया के कल्चर से उपचारित किया जाता है। इसके लिए कल्चर को 1 लीटर पानी व 100 ग्राम गुड़ के घोल में मिला लिया जाता है। एक हेक्टेयर खेत के लिए प्रयोग होने वाले बीज की मात्रा को इस कल्चर के साथ मिलाकर छाया में सुखाकर 24 घंटे के अंदर बुवाई कर दी जाती है। प्रारंभ में अधिक उपज लेने के लिए बरसीम के बीज के साथ सरसों या लाही अथवा गोभिया सरसों 2 से 4 किलोग्राम जई 40 से 50 किलोग्राम बीज को मिलाकर बोया जाता है।
Green Fodder: बरसीम की खेती के लिए पोषक तत्व प्रबंधन Nutrient Management for Barseem Cultivation
बरसीम से भरपूर चारा उत्पादन के लिए 15-20 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद को खेत की तैयारी से पहले मिला दें। इसके बाद मृदा जांच करवाकर या 20:60:30 किलोग्राम नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश उर्वरकों को अंतिम जुताई के समय खेत में मिलाना चाहिए।

बरसीम की खेती के लिए सिचाई प्रबंधन Irrigation Management for Barseem Cultivation
बरसीम ज्यादा पानी चाहने वाली फसल है। प्रारम्भ में अच्छे अंकुरण एवं बृद्धि के लिए 7 से 10 के अंतर पर हल्की 2 सिचाइयां देना लाभदायक है। बाद में मृदा एवं मौसम के अनुसार 15 से 20 दिन के अंतराल पर सिचाई की आवश्यकता होती है। या अक्टूबर से फरवरी माह तक प्रत्येक 12-15 दिन में तथा मार्च और अप्रैल माह में 8-10 दिन के अंतराल में सिंचाई करनी चाहिए। इस प्रकार फसल के पूरे जीवनकाल में लगभग 12 से 15 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।
बरसीम की खेती में खरपतवार प्रबंधन Weed management in Barseem cultivation
कृषि विज्ञान केंद्र आरबीएस कॉलेज बिचपुरी के विशेषज्ञ पशुपालन धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि किसान को बरसीम में खरपतवार प्रबंधन के लिए कासनी मुक्त बीज का प्रयोग करना चाहिए। खरपतवारनाशी के रूप में इमेजाथापर (परसुइट 10/एसएल) 0.10 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर दवा को बुवाई के 20-25 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए। बरसीम के बीज के साथ सरसों या राया का बीज मिलाकर बोने से खरपतवारों की वृद्धि कम होती है। खरपतवारों की वृद्धि कम करने के लिए बुवाई उपयुक्त समय पर ही करनी चाहिए।

Green Fodder: बरसीम की फसल कि ऐसे करें सुरक्षा How to protect Barseem crop
कृषि विज्ञान केंद्र आरबीएस कॉलेज बिचपुरी के विशेषज्ञ पशुपालन धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि किसानबरसीम एक चारा फसल है, इसलिए यह भी आवश्यक है कि फसल रोग की रोकथाम भी उचित विधि से की जानी चाहिए। बरसीम में पाये जाने वाले मुख्य रोग एवं उनकी रोकथाम की जानकारी इस प्रकार है।
जड़ गलन रोग जनक– कवक, राइजोक्टोनिया सोलानी, फुजेरियम सेमिटेक्टम और मैक्रोफोमिना फेजेओलीना आदि रोग लगते हैं, जिससे फसल को नुकसान होता है।
लक्षण– हल्के भूरे रंग के नैक्रोटिक (काले धब्बे) आमतौर पर मिट्टी की सतह से 5 सेंटीमीटर नीचे बनते हैं। और बाद में मिलकर सड़न का रूप ले लेते हैं। इस बीमारी से प्रभावित पौधों को खेत में आसानी से देखा जा सकता है। क्योंकि इसमें छोटे और जले हुए पौधों के धब्बे बनाते हैं।
तना गलन रोग जनक– बरसीम की फसल में स्क्लेरोटिनिया ट्राईफोलिओरम आदि रोग लगते हैं, जिससे फसल को नुकसान होता है।
लक्षण– बरसीम की फसल में इस रोग से पत्तियां सूखने से पहले जैतून-खाकी-भूरे रंग की हो जाती हैं। और कवक जाल से ढक जाती है। कवक जाल डंठल और तने के माध्यम से बडता हुआ अन्ततः मुख्य जड मे प्रवेश कर जाता है। बरसीम सडन संक्रमण पौधों के बीच भी कवक जाल के माध्यम से फैल सकता है। इस प्रकार खेत में मृत पौधों के चकत्ते बन जाते है। और संक्रमित मृत पौधे खाकी कवक जाल द्वारा ढक जाते है। जिसमे काले स्केलेरोसिया मिट्टी के स्तर पर मृत पौधों के ऊतक में या मृत पौधों के नजदीक मिट्टी में बनते है। जिससे यह मृदा जनित रोग बन जाता है।
बरसीम की फसल का प्रबंधन Berseem crop management
कृषि विज्ञान केंद्र आरबीएस कॉलेज बिचपुरी के विशेषज्ञ पशुपालन धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि किसान बरसीम में उचित जल निकासी का प्रबंध करें। तना सडन रोग जनक की मिट्टी में स्थित कवक संरचनाओं स्केलेरोसिया को नष्ट करने के लिए ग्रीष्म कालीन जुताई जरूर करें। तना और जड़ सड़न के लिए प्रतिरोधी प्रजातियों जैसे बुंदेल बरसीम-3 का उपयोग करें।
कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम के साथ बीज उपचार और कार्बाेफुरान 3 जी 1 ग्राम प्रति मीटर पंक्ति के साथ मृदा उपचार करने के बाद नीम सीड केर्नल एक्सट्रैक्ट 5 प्रतिशत का पत्तों पर छिड़काव कटाई के हर 15 दिन बाद करें। या वेविस्टिन और थिरम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या ट्राइकोडर्मा वेरेड़ी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम के साथ बीज बायो प्राइमिंग और नीम खली 400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का उपयोग करना चाहिए।
चने की सुंडी के कीट का लार्वा पौधों की पत्तियों और फूलों को खाता है। इसकी रोकथाम के लिए एमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत एसजी 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी या नोवलूरान 10 प्रतिशत ई.सी 1 मिली प्रति लीटर पानी दवा का घोल बनाकर छिड़काव करें। कीट का प्रकोप ज्यादा होने पर आवश्यकतानुसार दूसरा स्प्रे 15 दिन बाद भी कर सकते है। दवा के छिड़काव के बाद चारे को कम से कम 15 दिन बाद ही काटके पशुओं को खिलाना चाहिए।
बरसीम की कटाई एवं चारा उपज Barseem harvesting and fodder production
बरसीम की पहली कटाई 50-55 दिन पर और उसके बाद की 5-6 कटाई 25-30 दिनों के अंतराल पर करें। वैज्ञानिक तरीके से उगायी गयी फसल से 800-1100 कुंतल हरा चारा प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है।

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