Electricity Privatisation in UP: उप्र में बिजली निजीकरण को लेकर 84 वें दिन भी बिजली कर्मचारियों का विरोध जारी रहा। यूपी विधानसभा में ऊर्जा मंत्री के निजीकरण के वक्तव्य से बिजली कर्मियों में आक्रोश है। क्योंकि, यूपी में यदि बिजली निजीकरण हुआ तो बिजली विभाग में स्थाई और अस्थाई के 78489 पद खतरे में पड़ जाएंगे।
लखनऊ/ उत्तर प्रदेश.
Electricity Privatisation in UP: उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण के विरोध में कर्मचारी आंदोलन कर रहे हैं। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के नेतृत्व में कर्मचारी एकजुट हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा के बिजली निजीकरण के पक्ष में दिए गए वक्तव्य से बिजली कर्मियों में भारी आक्रोश व्याप्त हो गया है। संघर्ष समिति ने कहा है कि विकसित भारत के लिए बिजली का निजीकरण नहीं, अपितु सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली उद्योग को रखा जाना प्राथमिक आवश्यकता है। इसलिए, सरकार से मांग है कि बिजली निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल निरस्त करें। इसके साथ ही यूपी में बिजली कर्मचारियों को निजीकरण विरोध में 84 वें दिन भी विरोध प्रदर्शन (Electricity Privatisation in UP) जारी रहा।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के पदाधिकारियों ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निवेदन है कि बिजली की आपूर्ति में किए गए प्रभावी सुधार के दृष्टिगत पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की चल रही प्रक्रिया तत्काल निरस्त करें। विकसित भारत के लिये निजीकरण नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली प्राथमिक आवश्यकता है।

Electricity Privatisation in UP: कंपनियां बढ़ाएंगी बिजली की दरें (Companies will increase electricity rates)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि निजी क्षेत्र के लिए बिजली एक व्यापार है। जबकि, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए बिजली एक सेवा है। आगरा में टोरेंट पॉवर कंपनी का प्रयोग इसका एक बडा प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऊर्जा मंत्री ने विधानसभा में स्वयं स्वीकार किया है कि निजी घरानों के साथ बहुत महंगी दरों पर बिजली खरीद के करार उप्र में बिजली की दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि बहुत महंगी दरों पर निजी घरानों से बिजली खरीदने के कारण पॉवर कॉरपोरेशन को लगातार घाटा उठाना पड़ रहा है। इसका उत्तरदायित्व सरकार और प्रबंधन का है, कर्मचारियों का नहीं। उन्होंने कहा कि निजीकरण के बाद भी 25-25 वर्ष के लिए किए गये लॉन्ग टर्म बिजली खरीद करारों में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। स्वाभाविक है कि निजी कम्पनी महंगे बिजली खरीद करारों की भरपाई के लिए बिजली की दरें बढ़ाएगा। निजी क्षेत्र महंगी दरों पर बिजली खरीद कर सस्ते दाम पर उपभोक्ताओं को कभी नहीं देगा। आगरा इसका उदाहरण है।
Electricity Privatisation in UP: आगरा में टोरेंट पॉवर कंपनी लाइसेंसी नहीं (Torrent Power Company is not a licensee in Agra)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने बताया कि आगरा में टोरेंट कंपनी के विषय में ऊर्जा मंत्री का दिया गया बयान अर्ध सत्य है। आगरा में टोरेंट पॉवर कंपनी लाइसेंसी नहीं है। यह अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी है। अतः पॉवर कारपोरेशन फ्रेंचाइजी को बिजली देता है और फ्रेंचाइजी उसी दर पर बिजली बेचती है जो लाइसेंसी(पॉवर कारपोरेशन)की विक्रय दर है। ऊर्जा मंत्री को यह भी बताना चाहिए कि पॉवर कारपोरेशन 05.55 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद कर टोरेंट पावर कंपनी को 04.36 रुपए प्रति यूनिट पर बेचती है।

Electricity Privatisation in UP: आगरा में निजीकरण से हजारों करोड़ रुपए का घाटा (Privatisation in Agra leads to loss of thousands of crores of rupees)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि अकेले वर्ष 2023-24 में ही पॉवर कारपोरेशन को 275 करोड रुपए का घाटा हुआ है। दूसरी ओर 04.36 रुपए प्रति यूनिट पर पावर कारपोरेशन से बिजली लेकर टोरेंट पावर कंपनी ने आगरा में औसत 07.98 रुपए प्रति यूनिट पर बिजली बेंच कर वर्ष 2023-24 में 800 करोड रुपए का मुनाफा कमाया है। यदि निजीकरण न हुआ होता तो यह मुनाफा पावर कारपोरेशन को मिलता। इस तरह निजीकरण के इस प्रयोग से पॉवर कॉरपोरेशन को कुल 1000 करोड़ रुपए का घाटा मात्र एक साल हुआ है। इस प्रकार विगत 15 वर्षों में आगरा के निजीकरण से पॉवर कॉरपोरेशन को हजारों करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है।
Electricity Privatisation in UP: बिजली कर्मियों की बड़े पैमाने पर छंटनी (Large scale retrenchment of electricity workers)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि ऊर्जा मंत्री के बयान से और स्पष्ट हो गया है कि निजीकरण से बिजली कर्मियों की बड़े पैमाने पर छटनी होने जा रही है। ऊर्जा मंत्री ने विधानसभा में कहा है कि आगरा की बिजली व्यवस्था टोरेंट पावर कंपनी को देने के बाद वहां काम कर रहे कर्मचारियों को अन्य ऊर्जा निगमों में भेज दिया गया था।

Electricity Privatisation in UP: पहले ही संविदा कर्मियों को निकाला जा रहा (Contract workers are already being fired)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि आगरा में बहुत कम कर्मचारी थे। जिनका अन्य ऊर्जा निगमों में समायोजन किया जा सका था। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम में लगभग 26500 नियमित कर्मचारी और लगभग 50 हजार संविदा कर्मी कार्यरत हैं। इतनी बड़ी संख्या में बिजली कर्मचारियों और संविदा कर्मियों को अन्य ऊर्जा निगमों में समायोजित करना सम्भव नहीं है। ऐसी स्थिति में बहुत बड़े पैमाने पर बिजली कर्मियों की छटनी होगी। उन्होंने कहा कि निजीकरण किए जाने के पहले ही संविदा कर्मियों को निकाला जा रहा है, फिर निजीकरण के बाद तो उनकी नौकरी जाना निश्चित ही है। इस मामले में ऊर्जा मंत्री का वक्तव्य कि कर्मचारियों की कोई छटनी नहीं होगी, पूरी तरह भ्रामक है।
Electricity Privatisation in UP: उप्र में बिजली के निजीकरण का तर्क सही नहीं (The argument of privatization of electricity in UP is not correct)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि बिजली की प्रति यूनिट खपत का बिजली के निजीकरण से कोई संबंध नहीं है। बिजली की प्रति यूनिट खपत राज्य की खुशहाली पर निर्भर करती है। संघर्ष समिति ने कहा कि ऊर्जा मंत्री ने प्रति यूनिट बिजली की खपत के मामले में जिन अग्रणी प्रांतों पंजाब (2350 यूनिट प्रति व्यक्ति), महाराष्ट्र(1588 यूनिट प्रति व्यक्ति), उत्तराखंड (1520 यूनिट प्रति व्यक्ति), राजस्थान(1345 यूनिट प्रति व्यक्ति),मध्य प्रदेश (1232 यूनिट प्रति व्यक्ति) का उल्लेख किया है उन सभी प्रान्तों में बिजली सार्वजनिक क्षेत्र में ही है। अतः इस आधार पर उप्र में बिजली के निजीकरण का तर्क पूरी तरह गलत है।

Electricity Privatisation in UP: 24 घंटे बिजली देने को निजीकरण गलत (Privatisation is wrong to provide 24 hours electricity)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि जहां तक 24 घंटे बिजली देने का प्रश्न है, राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में स्वयं कहा है कि प्रदेश में बिजली की व्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है। उत्तर प्रदेश के 24 घंटे, तहसील स्तर पर 22 घंटे 35 मिनट और गांव में 20 घंटे 34 मिनट निर्बाध बिजली की आपूर्ति की जा रही है। अतः ऊर्जा मंत्री का यह वक्तव्य कि 24 घंटे बिजली देने के लिए निजीकरण किया जा रहा है पूरी तरह गलत है।
Electricity Privatisation in UP: कई प्रदेश में बिजली सार्वजनिक क्षेत्र में (Electricity in public sector in many states)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि विकसित भारत के लिए निजीकरण नहीं अपितु सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली आवश्यक है। विकसित भारत की दिशा में महती भूमिका निभाने वाले गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा जैसे सम्पन्न प्रांतों में भी बिजली सार्वजनिक क्षेत्र में ही है।
Electricity Privatisation in UP: 84 वें दिन विरोध प्रदर्शन जारी रहा (Protests continued for the 84th day)
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि संघर्ष समिति के आह्वान पर बुधवार को भी लगातार 84 वें दिन प्रदेश के सभी जनपदों और परियोजना मुख्यालय पर बिजली कर्मचारियों ने निजीकरण के विरोध में प्रदर्शन जारी रखा। किसी भी स्थिति में निजीकरण स्वीकार्य नहीं है और निजीकरण के विरोध में तब तक आन्दोलन जारी रहेगा। जब तक निजीकरण करने का निर्णय वापस नहीं लिया जाता।
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